Monday, October 8, 2012

ये कैसे रिश्तें नातें हैं



ये कैसे रिश्तें नातें हैं
 कभी तो कितने अपने   ,और कभी पराएँ हो जातें हैं 
चाह  कर भी इन्हें हैं  मुश्किल   भुलाना 
क्यों दिल के अपने  इतनी तकलीफ
 रूह तक दस्तक दे जातें हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

मैं मेरा कोरा मन युही नही स्याही स्याही करती 
कुछ तो चलती हैं रिश्तों की  पतझड़ हवाएं ,
फिर तो लिख ही जाता हैं दस्तावेज दिल के कटघेरे  में ,

कब तक मुझसे लेतें रहेंगे ,,
क्या कभी उतरेगा मेरी छत पे भी
कोई  पोटली बाबा 

मैं हु इक हवेली जैसी ,
जिसके खाब   का  दर  बंद हैं 
जीना हैं इस लियें जी रही हूँ ,
वरना अब कहा पायलों में छम छम हैं 
   
  ये हर तरफ से खिचातनी हैं 
गनीमत हैं की अभी तलक 
साँस लेने पे नही कोई पाबन्दी हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

  न ये मेरा घर हैं जहाँ मैं कली से बनी फूल पलाश की 
  न वो मेरा घर हैं जहाँ मैं गयी चुटकी भर लाल रंग से 
  तो बता जरा वाटिका छबी नन्द लाल   की  
  कौन से हित खातिर तुने रचा मुझे धरती की गोद में 

 मैं मेरे रंग से जीवन सजा लूं ,
   तो कसम राम जी की 
   धरती में कोहराम हैं 
   मैं ज्यादा तो नही मांगती 
   बस    दो टूक    ही सही 
    लेकिन मुझको मेरा ही आसमान मिलें 

  इक सवाल सी हैं  कैलाश नगर के दरबार में  
  ना वो बाबुल का हो ,ना साजन  का  
इक घर ऐसा हो जिसके दरवाजें पे लिखा मेरा नाम हो 
   


   

Tuesday, July 17, 2012


ये जो बे -नाम सा है ..... 


दिल  ये कहता है की
 टूटकर तुम्हें  प्यार करू ..
हया की बदली बरस जाएँ ..
प्यार का सावन..
अब  बाँहों में झूल जाएँ ।


सजाकर मेंहदी अपने हाथों में ,
लाल रंग भर के तुम्हारी  आखों में ..
आपना चेहरा सवारूँ ........
दिल ये कहता है की 
टूटकर तुम्हें प्यार करू 


वो नक्स सा  जो बन जाता है ...
रातों को टहनियों की बीच झाक्तें चाँद पर ..
फिर सुबह तलक चलती है ..
चाँद और मेरी मेजबानी ,
मांझी मेरे कावेरी मन के  ...
दिल ये कहता है की ....


कभी तो राजे दिल बीछ   जाता 
छुप छुप कर ...
तेरे मन के घरौंदे में  
इन पल्कों के  शिरकत से ,
कभी तुम सज जाते ...
बनकर फूल पलाश के 
मेरे रोहणि मन में ,,


न मैं जता  पाती हु ,
न तुम ही कह पातें हो ,

बुला ही लेता है ..
गुलमोहर दिल तुम्हारा .
हर रोज मुझे ...
नीन्द्नीशा  सिरहाने  में
 ये कौन सा बंधन  है   ..
जिस में तुम मुझे बाँधें जातें हो .... ??
दिल ये कहता है की 
टूटकर तुम्हें प्यार करू ....




क्यूँ मुड़ जाती हैं 
राहें मेरी 
तेरे बनबेली आँगन में 


ना नाम है ,ना इंतजार का इंतजार .
 पांकिजा से इस प्यार में ..
बस एक अहसाह की नमीं  सी है ...
 जो मेरे मनं में घुलता है अमरलता बनकर ।


दिल ये कहता है की 
टूटकर तुम्हें प्यार करू 


हया की बदली बरस जाएँ ..
प्यार का सावन..
अब  बाँहों में झूल जाएँ ।



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Saturday, June 30, 2012

'मेरे पंछी मन



उड़  उड़ के मेरे पंछी मन तू क्या खोजता है,

हर तरफ शोर है ,किन सुकूनी   संतों की तुझे तलाश है,
वो जो भाव हुआ करते थे गोधुलि की बेला में ,
वो जो भाव उभरते थे धरती और अम्बर  के मिलन से,
वो जो घोसोलों से मीठी धुन भोर का मुख निहारती थी,
" मेरे बवाले पंछी मन" 
 उसे तो शहरीकरण रूपी दानव ने अपना आहार बना लिया है।

अब तो सुकून भरी पलकों से भी दूर भागते हैं लोग ,

नींद आये या न आये-
 कुछ तो  थोरी सी मदिरा पीकर सो जाते हैं
 और कुछ सोने की कोशिश में सुबह तलक झप्की भरते हैं
जाने किस मृग तृष्णा की खोज   में सब दौर रहे हैं ?
कौन समझेगा किसने समझा है ...

देह रूपी दुकान का सांसे  पतवार हैं,
कब  मिट्टी हो जाएँ क्या ऐतबार   है।।

 क्यों है फैला बेरुखी का आलम ,

 क्यों है रिश्तों में टूटी पगडंडी सी  हालत ,
 क्यों मन में बोझ लिए जीयें जा रहे हैं लोग ,
 थोड़ी तो नमी से  खुद को नवाजों फकीरों ....
 है ये दुनिया बड़ी निराली ........
पहले खुद में निरालापन , तो  लायों फकीरों

वो जो  आँखों से आँखें  इश्क की हर बात बयाँ करती थी,

         उफ वो नशेमन "
              वो शानो पर बीती फुरकतों में रातें ........

         अब तो पहली नजर से पहले ,,  काया से काया मिला करती हैं
              जाने ये कौन हैं , ये किसकी दास्तां  हैं ???

          कैसे इनको   तू - पंछी मन इनकी पहचान  से मिलवायेगा

  क्या फिर से धरती पर  राधारमण आलिंगन  रास रचाय्रेगें ।   


वो जो पत्तों पर ओस की चमक है ,

वो जो बारिश में धूलि फूलों में रंगत है
 वो जो प्यार में पिघलती पत्थरों की पनघट है

वो जो दूर से लचकती  अमोलियों  की कमर है
ये जो चूड़ियों की खनक में महकती  कशक है

ये जो लोरियों में निखरती बचपन से जवानी का सफ़र है
ये जो  पथराई आँखों को सूद से मूल स्वरित   है

ये जो माहवार से सजे पाँव पर झुका  पुरुषसार्थ का अहम हैं  

  ये  जो स्वार्थहीन दोस्ती का छलकता सागर है

सुनो ऐ फकीरों ये सब तुम्हारी ही  विरासतें हैं 

यही है वो दौलत बासिंदों ,
जिन  से इक इक बूंद  जिन्दगी की सागर बना करती है
तो अब चुन लो मोतियाँ विरासतों से ,                                             

  और बाटो दोनों हाथों से ये विरासती मोतियाँ पुरे जहाँ में 


जितना बाटोगे उस से दुगना पायोगे फकीरों ............
 हर कण हर पल बस होगा लचीला ,लचीला

और उमरती घुमारती रहेगी

  तेरे पंछी मन में  जवां जिन्दगी की बदलियाँ ...।।



अब तो मेरे पंछी मन मेरे पास लौट आओ 

बनने दो राहतों के सिलवटें मेरे भी दरीचों पर ......
फिर कभी और चुन लाना शब्दों के जंगलों से  
मुहबोली कविता की सहेली .........
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Tuesday, June 26, 2012

अह्सास


कितना प्यारा ये अह्सास है,

जो  बिजली से मुझे बरखा बनता हैं ।

हर पल हर कही तुम्हें मेरे साथ पिरोता है 

अपने नयनों के  तीखे विचारों से ,

लगाई बेड़ियाँ हमने ,इन अहसासों के पंखों पर '

 जाने कब ये बेड़िया पाज़ेब बन
  "और " 

तुम्हें  छूकर ये अहसास ,बिन सावन फुहारों के झूले  झूलता हैं ।

कितना प्यारा है ये अहसास ......... 

निगोड़ी इन अहसासों का बावला मन तो देखो ;

वही छनकती हैं इनकी  पाज़ेब ''
    
 जिनसे पर्दा कर कोताहल करती हैं ।
          
 धिरे धिरे रेशमी रातों में,  
मंतरंग  में सपनों की  डोली सजाती  हैं "
   '  और "
चुपके के से  अलसाई  नींद विहल में हलचल  मचाकर ,,  
            
   हौले से कह जाती है .. 
कितना प्यारा ये अहसास है ,
 जो बिजली से मुझे बरखा बनता है 

की हमने तामाम कोशिशे ,,,,,, 
की न छू; सके हमे उन बेहोश नाजरों का  ख़ुमार ,
      ' पर'
ये अहसास बस   एक बूंद बनकर ,

बंध गया हमारे दुपट्टे के कोने  से  ,

  जैसे ही दुपट्टे के कोने से .........आँखें थप  थपाई हमने ,,

आँखों से उतरकर बूंद दिल में सागर बन गया,

'और'  तब से ही ये आलम है
 हम अपने ही अह्सासी बारिश में भिंग कर  सराबोर हो रहे हैं 

अब ये सैलाब कहाँ ले जायेगा हमें ??
 ये तो  शायरी ऐं ग़ालिब तेरे हवाले ।

कितना प्यारा ये अहसास है ....
जो मुझे बिजली से बरखा बनता है  ..........

ये कैसी खुशबू सी है फैली , हमारे सिरहाने के तले,,

कजराई कवारें तराईयों में ...
अभी भी छलक रहा है वो पैमाना  कवारा  कवारा'  
नही जानती ये आँखें ...  

 कितने बरस हैं और अभी,


 इन आँखों में की तराईयों में ,,,   ये कवारी काजलें ?
जो बिखरकर मोती से नूर की बूंद  बन गयी,

जो  इकतर्फा प्यार की मेंहदी  रचाकर ,

इश्किया तेरे आँगन में रंगों से भरी तस्वीर बन गयी,
  होगी कोई तो हद इन  बाँवरे अहसासों के..........                                 
         
  उस हद की हद तक ,तकेगे राह  ये कोने दुपट्टे के ,    

पीले सरसों के पायल किसी दिन तो छ्नकेगे ,

होगी किसी दिन तो चूड़ियों की रंग सुर्ख ,

होगा किसी दिन पूरा सावन मेरी   घंरायी बादलों में ,

हैं अभी तलक और रहेंगे ......प्यार के कशक में 

 मेरी तराईयों में ये काजल, और मेरे दुपट्टे कवारें  ,,

 कितना प्यारा ये अहसास है 
जो बिजली मुझे बरखा बनता हैं।
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Monday, March 5, 2012


इन  वादियों में ये खुशबू सी क्या है?
ये पीले रंग के सरसों, क्यों हवायो से  अटखेल में है ,
क्या है ये मेरे मनआगन की खुशियों की पालकी ...
जो चाहती है की सब खुश रहें ........

मेरे पन्नो पे ये सियाही सी गोधुली ने सजा दी हैं ,
लगता है आज फिर आसमान से परिंदों ने , 
कुछ आफसाने रिश्तों के , मेरे छत पे गिरा दिए हैं  

जब प्यार के रंग बिखारातें हैं लोग ,
जब इन्सान ही इन्सान से मिलता हैं ,
और जब ,जब किसी मजबुर का भला होता हैं,,,
तब ही नजर आतें हैं भगवान.   

Saturday, February 25, 2012


जब पिता खुश होकर शाबाशी देंतें हैं ,
जब दूसरों के चेहेरें पर मुश्कान सी खील  जाती हैं ,
जब माँ की लोरी सुनकर मासूम सो जातें हैं ,
बस इन्ही राहों से चल कर भगवान  मिल जातें हैं. 

Wednesday, February 8, 2012

हुई शाम तो ये जाना हमने
तन्हाईयों  की कुछ और अमोली सज गई हमारे दरिचें में 
अब देखे सुबह की बेल  इनअमोलियों को  पका सकी तो ठीक है
नही तो जी लेगे हम जैसे जिए जाते हैं