Tuesday, April 29, 2025

कैसे रिश्ते नाते हैं।

 कैसे रिश्ते-नाते हैं
(लेखिका: @retrovd007), pen name सुकून 

ये कैसे रिश्ते-नाते हैं...
कभी कितने अपने,
तो कभी अजनबी बन जाते हैं।
चाहकर भी मुश्किल है इन्हें भुला पाना,
क्यों दिल के अपने
इतनी तकलीफ़ दे जाते हैं,
रूह तक दस्तक दे जाते हैं...
ये कैसे रिश्ते-नाते हैं।

मेरा मन यूँ ही कोरा नहीं
स्याही-स्याही रहता,
कुछ तो चलती हैं
रिश्तों की पतझड़ हवाएँ।
फिर तो लिख ही जाती हूँ
दिल के कटघरे में
एक दस्तावेज़... चुपचाप।

कब तक मुझसे लेते रहोगे सब?
क्या कभी मेरी छत पर भी
उतरेगा  कोई पोटली, बाबा?

मैं हूँ... इक हवेली जैसी—
जिसके ख़्वाबों का दरवाज़ा बंद है।
जी रही हूँ,
क्योंकि जीना मजबूरी है,
वरना अब कहाँ
पायल में वो ‘छम-छम’ है।

हर ओर खिंचातानी है,
ग़नीमत है कि अभी तक
साँस लेने पर पाबंदी नहीं।

ये कैसे रिश्ते-नाते हैं...

न ये मेरा घर है
जहाँ मैं कली से पलाश बनी,
न वो मेरा घर
जहाँ मैं गई चुटकी भर लाल रंग में।
तो फिर बता, हे नंदलाल,
किस हित तूने मुझे
धरती की गोद में रचा?

मैं अपने ही रंगों से
जीवन सजा लूँ,
तो कसम राम जी की—
कोहराम मच जाता है।
मैं ज़्यादा तो नहीं माँगती,
बस दो टूक ही सही,
पर मेरा खुद का आसमान तो मिले!

एक सवाल सी हूँ
कैलाश नगर के दरबार में—
ना बाबुल की, ना साजन की।
बस एक घर चाहिए,
जिसके दरवाज़े पर
लिखा हो मेरा नाम...

Saturday, April 12, 2025

मुहब्बत करना !


रखना दिल में  नमाज़ी  नियत 
तो  
मुहब्बत करना !
होना खुद से जुदा 
तो 
मुहब्बत करना !

हो बरगद जैसी छावनी 
तो 
मुहब्बत करना !

शिदत हो गर दिया बाती जैसा ,
 तो 
मुहब्बत करना!
मुस्कानों में हो  नमीं पनघट की ,
तो 
मुहब्बत करना !

तन में हो खुशबूँ  गंधक की 
तो
 मुहब्बत करना!

 गर बाँच सकों कल्माई ऑंखें 
तो 
मुहब्बत करना !

बना सको जिगर  शिखर में मंदिर 
तो 
मुहब्बत करना !

हो जबां अशिर्बादी 
तो 
मुहब्बत करना!

हो रूह तक चौधवी   चमक 
तो 
मुहब्बत करना !

चल सकों राह से राह तक 
तो
 मुहब्बत करना !

जो समां सके इक ग्रन्थ में 
ये वो सज्दां नही ,

मिल सके अंत छितीज 
ये वो त्रिलोक नही 
हो हर मन  राधा रमण 
करें हर दिल बस ऐसी ही 
पाकिजी मुहब्बत 
हर कही  हर तरफ .......






Monday, April 7, 2025

इक शहर तो हो अपना सा



उमिंदों के काफिलें बसाकर ख्वाबों के गाँव में ,




वो कहतें हैं की अब ये शहर अपना नही ,

जिस शहर की गलियों ने उनको जीने की राह दी ,

उसे छोड़ जाने से बंजाड़े का दिल धड़का नही,

खुश होकर तह दर सजाई अमर लताओं की डालें,

बनफूल से भी ज्यादा खिली

घर के कोने कोने में बसी अटखेलियाँ

और रही हरदम ही बिखरती मदहोशियाँ

अभी थोड़ा वक्त ही चला था ,

नयें विशातों के सिरहाने से

की !!

शहर के चौराहें पे मचां रहा कोई  शोर था ,


हवलें- हवलें आ रही थी आवाजें,
चारो तरफ भीड़ था बड़ा भीड़ था 

लेकिन क्या खूब नजारा था …। 

शहर के चौराहें पर शहर ही मचां रहा शोर था ,

और जोड़ -जोड़ से बंजlड़ें को लगा रहा आवाज़ था

कब तक यहां वहां रहेगी ,

तेरी दरो दिवार की तस्वीरें ,

किसी गली ,किसी मोड़ पे  या दूर किसी चौराहें पे ,

हक हो अपनेपन का ,

अरे किसी शहर से तेरा भी नाता हो 

कह सके तू भी 

अपनी पनाहों के  छाँव से ,

ये शहर मेरा अपना हैं कोई बेगाना नही ,

कुछ यहाँ मिला हैं ।कुछ वहाँ  मिलेगा …. 

जाने क्या कुछ - कहाँ  छूटता रहेगा ?

उफ ये कैसी बिरहन सी बात चली हैं ,

छोड़ों  भी ये कम ज्यादा  ।और ज्यादा  पाने की लालसा ,

हो थोडा सा या ज्यादा … 

बस लेकिन कम से कम ,

इक शहर तो हो अपना सा …. 

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Thursday, February 27, 2025

ये कौन हैं

ये कौन हैं 
 जो  मेरें दिल की धरती पे फैल रहां हैं सार्थक धुप बनकर 
 समंदर में समंदर का नर्तन करा रहा हैं 
पल पल में सदियों की साँसें जोड़ रहां  हैं ,
हर बूंद में आकाश गंगा बरसा रहा हैं , 
ये कौन हैं जो
 मुझको दीवानी कर खुद घूम रहा हैं होश  वाला बनकर 

मेरे तन के टहनियों में बनता जा रहा हैं प्यार की पतियाँ ,
जब थक जाता हैं शोरें हरकत ज़माने की अदा  से ,
तो पूछता हैं खुद की महफिल में गवाह बनकर 
तू कौन हैं जो मुझमें उतरती जा र!ही हैं सरगम बनकर  !  

चंचल मन फकीरा जैसा, हैं ये बिलकुल चाँद तारों जैसा ,
रखता हैं दिल में अदब नबाबों जैसा ,
हैं तो खुद परेशा  हथेलियों में छबी लकीरों से ,
बाँटता फिरता हैं फिर भी खुशियाँ  जुगनुयों जैसा  ,
ये कौन हैं ..
जिसे बचाकर आफतों से रखना चाहतें हैं,
 दिल में कुदरत तेरी अमानत समझकर 
ये कौन हैं 
जो  मुझ में  जी रहा हैं   मेरी जिंदगी बनकर .............   
           
क्यों हैं तुझ से इतनी मुहब्बत बतां जरा ,
 पहचानता क्यों हैं मेरे नैनो के दस्तक बतां जरां, 
रुकता क्यों हैं मेरी सोच पे दर्सा जरां ,
मैं राह नही तेरी तो मुड़ता क्यों हैं मेरी ओर -जता जरां ,
हक से हैं तू प्रेम्परिसर में बैठा 
क्या हैं तुझ में मेरा भी आना जाना समझा जरां 

न पहले तू कुछ बोल न अब बोल पायेगा ,
दिया हैं तुझ को ही सारा सनातन 
लेकिन मान ले मेरी इक ही अर्जी 
हु मैं संग -संग तेरे 
बस हर पल तू मुस्कुरा जरां  


 


Wednesday, October 30, 2024

ये कैसे रिश्तें नातें हैं



ये कैसे रिश्तें नातें हैं
 कभी तो कितने अपने   ,और कभी पराएँ हो जातें हैं 
चाह  कर भी इन्हें हैं  मुश्किल   भुलाना 
क्यों दिल के अपने  इतनी तकलीफ
 रूह तक दस्तक दे जातें हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

मैं मेरा कोरा मन युही नही स्याही स्याही करती 
कुछ तो चलती हैं रिश्तों की  पतझड़ हवाएं ,
फिर तो लिख ही जाता हैं दस्तावेज दिल के कटघेरे  में ,

कब तक मुझसे लेतें रहेंगे ,,
क्या कभी उतरेगा मेरी छत पे भी
कोई  पोटली बाबा 

मैं हु इक हवेली जैसी ,
जिसके खाब   का  दर  बंद हैं 
जीना हैं इस लियें जी रही हूँ ,
वरना अब कहा पायलों में छम छम हैं 
   
  ये हर तरफ से खिचातनी हैं 
गनीमत हैं की अभी तलक 
साँस लेने पे नही कोई पाबन्दी हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

  न ये मेरा घर हैं जहाँ मैं कली से बनी फूल पलाश की 
  न वो मेरा घर हैं जहाँ मैं गयी चुटकी भर लाल रंग से 
  तो बता जरा वाटिका छबी नन्द लाल   की  
  कौन से हित खातिर तुने रचा मुझे धरती की गोद में 

 मैं मेरे रंग से जीवन सजा लूं ,
   तो कसम राम जी की 
   धरती में कोहराम हैं 
   मैं ज्यादा तो नही मांगती 
   बस    दो टूक    ही सही 
    लेकिन मुझको मेरा ही आसमान मिलें 

  इक सवाल सी हैं  कैलाश नगर के दरबार में  
  ना वो बाबुल का हो ,ना साजन  का  
इक घर ऐसा हो जिसके दरवाजें पे लिखा मेरा नाम हो 
   


   

Monday, September 30, 2024

दबे पाँव जिंदगी चलती रही

दबे पाँव जिंदगी चलती रही ,
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

 स्याही  और कलम रेंगती रही 
 रात भर बाँट टटोलती रही ,
ना आह निकली ,ना कराह 
शब्दों के जंगल में ,
खाली पायल झुठा नर्तन करती रही । 

दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

राह ढूंढ लेती मोतियाँ ,
मगर ?
शिप हर पल अपनी शक्ल बदलती रही ,
मन के सरहदों में जाने ,
और कितने? 
सरहदें खिंचेगी हसरतें । 
 सिरहाने   मे  बंद कमरा ,
स्वप्न बुनता रहा ,
और चुपके -चुपके 
भाग्य चिमनी चलाती रही 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

कुछ गुजर  कर  भी '
सुना हैं --लौट आतें हैं ,
दस्तकों पे नक्स  सजा जातें हैं ,

यें कैसा ? ख़ौफ हैं 
जो गुजरता भी नही ,
चीखता भी नही ,
बस आँखों में काज़ल खरोंचता रहता हैं 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.…

आँखें सोंचकर उनका दर्द  भी ,

आँसुओं की डली भर्ती रही ,
और बे-अदब ,बे- ख़बर 
दम भर  राहती साँस भरता रहा । 

मोम की तरह पिखलना ,
काँच की तरह टूटना ,
ये भाव अब बड़े बेगाने हैं ,
सागर की तरह हिलोरना ,
कुंकुम की तरह मिलना ,
ये भाव  अब हमारे   हैं ,
तोड़ने  वालें तोड़तें  रहे ,
और पुरवा ब्यार भी ,
सनसनाती कुदाल चलाती रही ॥  

दबे पाँव जिंदगी चलती रही
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

थककर बैठ जाऊं , 
  या झुझ कर लड़ जाऊं 
हारूंगी नहीं लड़ती रहूंगी 
जिंदगी तेरे साथ चलती रहूंगी।।
दबे पाँव जिंदगी चलती रही
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

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Thursday, November 16, 2023


जब पिता खुश होकर शाबाशी देंतें हैं ,
जब दूसरों के चेहेरें पर मुश्कान सी खील  जाती हैं ,
जब माँ की लोरी सुनकर मासूम सो जातें हैं ,
बस इन्ही राहों से चल कर भगवान  मिल जातें हैं.