Thursday, February 27, 2025

ये कौन हैं

ये कौन हैं 
 जो  मेरें दिल की धरती पे फैल रहां हैं सार्थक धुप बनकर 
 समंदर में समंदर का नर्तन करा रहा हैं 
पल पल में सदियों की साँसें जोड़ रहां  हैं ,
हर बूंद में आकाश गंगा बरसा रहा हैं , 
ये कौन हैं जो
 मुझको दीवानी कर खुद घूम रहा हैं होश  वाला बनकर 

मेरे तन के टहनियों में बनता जा रहा हैं प्यार की पतियाँ ,
जब थक जाता हैं शोरें हरकत ज़माने की अदा  से ,
तो पूछता हैं खुद की महफिल में गवाह बनकर 
तू कौन हैं जो मुझमें उतरती जा र!ही हैं सरगम बनकर  !  

चंचल मन फकीरा जैसा, हैं ये बिलकुल चाँद तारों जैसा ,
रखता हैं दिल में अदब नबाबों जैसा ,
हैं तो खुद परेशा  हथेलियों में छबी लकीरों से ,
बाँटता फिरता हैं फिर भी खुशियाँ  जुगनुयों जैसा  ,
ये कौन हैं ..
जिसे बचाकर आफतों से रखना चाहतें हैं,
 दिल में कुदरत तेरी अमानत समझकर 
ये कौन हैं 
जो  मुझ में  जी रहा हैं   मेरी जिंदगी बनकर .............   
           
क्यों हैं तुझ से इतनी मुहब्बत बतां जरा ,
 पहचानता क्यों हैं मेरे नैनो के दस्तक बतां जरां, 
रुकता क्यों हैं मेरी सोच पे दर्सा जरां ,
मैं राह नही तेरी तो मुड़ता क्यों हैं मेरी ओर -जता जरां ,
हक से हैं तू प्रेम्परिसर में बैठा 
क्या हैं तुझ में मेरा भी आना जाना समझा जरां 

न पहले तू कुछ बोल न अब बोल पायेगा ,
दिया हैं तुझ को ही सारा सनातन 
लेकिन मान ले मेरी इक ही अर्जी 
हु मैं संग -संग तेरे 
बस हर पल तू मुस्कुरा जरां  


 


Wednesday, October 30, 2024

ये कैसे रिश्तें नातें हैं



ये कैसे रिश्तें नातें हैं
 कभी तो कितने अपने   ,और कभी पराएँ हो जातें हैं 
चाह  कर भी इन्हें हैं  मुश्किल   भुलाना 
क्यों दिल के अपने  इतनी तकलीफ
 रूह तक दस्तक दे जातें हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

मैं मेरा कोरा मन युही नही स्याही स्याही करती 
कुछ तो चलती हैं रिश्तों की  पतझड़ हवाएं ,
फिर तो लिख ही जाता हैं दस्तावेज दिल के कटघेरे  में ,

कब तक मुझसे लेतें रहेंगे ,,
क्या कभी उतरेगा मेरी छत पे भी
कोई  पोटली बाबा 

मैं हु इक हवेली जैसी ,
जिसके खाब   का  दर  बंद हैं 
जीना हैं इस लियें जी रही हूँ ,
वरना अब कहा पायलों में छम छम हैं 
   
  ये हर तरफ से खिचातनी हैं 
गनीमत हैं की अभी तलक 
साँस लेने पे नही कोई पाबन्दी हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

  न ये मेरा घर हैं जहाँ मैं कली से बनी फूल पलाश की 
  न वो मेरा घर हैं जहाँ मैं गयी चुटकी भर लाल रंग से 
  तो बता जरा वाटिका छबी नन्द लाल   की  
  कौन से हित खातिर तुने रचा मुझे धरती की गोद में 

 मैं मेरे रंग से जीवन सजा लूं ,
   तो कसम राम जी की 
   धरती में कोहराम हैं 
   मैं ज्यादा तो नही मांगती 
   बस    दो टूक    ही सही 
    लेकिन मुझको मेरा ही आसमान मिलें 

  इक सवाल सी हैं  कैलाश नगर के दरबार में  
  ना वो बाबुल का हो ,ना साजन  का  
इक घर ऐसा हो जिसके दरवाजें पे लिखा मेरा नाम हो 
   


   

Monday, September 30, 2024

दबे पाँव जिंदगी चलती रही

दबे पाँव जिंदगी चलती रही ,
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

 स्याही  और कलम रेंगती रही 
 रात भर बाँट टटोलती रही ,
ना आह निकली ,ना कराह 
शब्दों के जंगल में ,
खाली पायल झुठा नर्तन करती रही । 

दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

राह ढूंढ लेती मोतियाँ ,
मगर ?
शिप हर पल अपनी शक्ल बदलती रही ,
मन के सरहदों में जाने ,
और कितने? 
सरहदें खिंचेगी हसरतें । 
 सिरहाने   मे  बंद कमरा ,
स्वप्न बुनता रहा ,
और चुपके -चुपके 
भाग्य चिमनी चलाती रही 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

कुछ गुजर  कर  भी '
सुना हैं --लौट आतें हैं ,
दस्तकों पे नक्स  सजा जातें हैं ,

यें कैसा ? ख़ौफ हैं 
जो गुजरता भी नही ,
चीखता भी नही ,
बस आँखों में काज़ल खरोंचता रहता हैं 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.…

आँखें सोंचकर उनका दर्द  भी ,

आँसुओं की डली भर्ती रही ,
और बे-अदब ,बे- ख़बर 
दम भर  राहती साँस भरता रहा । 

मोम की तरह पिखलना ,
काँच की तरह टूटना ,
ये भाव अब बड़े बेगाने हैं ,
सागर की तरह हिलोरना ,
कुंकुम की तरह मिलना ,
ये भाव  अब हमारे   हैं ,
तोड़ने  वालें तोड़तें  रहे ,
और पुरवा ब्यार भी ,
सनसनाती कुदाल चलाती रही ॥  

दबे पाँव जिंदगी चलती रही
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

थककर बैठ जाऊं , 
  या झुझ कर लड़ जाऊं 
हारूंगी नहीं लड़ती रहूंगी 
जिंदगी तेरे साथ चलती रहूंगी।।
दबे पाँव जिंदगी चलती रही
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

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Thursday, November 16, 2023


जब पिता खुश होकर शाबाशी देंतें हैं ,
जब दूसरों के चेहेरें पर मुश्कान सी खील  जाती हैं ,
जब माँ की लोरी सुनकर मासूम सो जातें हैं ,
बस इन्ही राहों से चल कर भगवान  मिल जातें हैं. 

Friday, November 3, 2023

'मेरे पंछी मन



उड़  उड़ के मेरे पंछी मन तू क्या खोजता है,

हर तरफ शोर है ,किन सुकूनी   संतों की तुझे तलाश है,
वो जो भाव हुआ करते थे गोधुलि की बेला में ,
वो जो भाव उभरते थे धरती और अम्बर  के मिलन से,
वो जो घोसोलों से मीठी धुन भोर का मुख निहारती थी,
" मेरे बवाले पंछी मन" 
 उसे तो शहरीकरण रूपी दानव ने अपना आहार बना लिया है।

अब तो सुकून भरी पलकों से भी दूर भागते हैं लोग ,

नींद आये या न आये-
 कुछ तो  थोरी सी मदिरा पीकर सो जाते हैं
 और कुछ सोने की कोशिश में सुबह तलक झप्की भरते हैं
जाने किस मृग तृष्णा की खोज   में सब दौर रहे हैं ?
कौन समझेगा किसने समझा है ...

देह रूपी दुकान का सांसे  पतवार हैं,
कब  मिट्टी हो जाएँ क्या ऐतबार   है।।

 क्यों है फैला बेरुखी का आलम ,

 क्यों है रिश्तों में टूटी पगडंडी सी  हालत ,
 क्यों मन में बोझ लिए जीयें जा रहे हैं लोग ,
 थोड़ी तो नमी से  खुद को नवाजों फकीरों ....
 है ये दुनिया बड़ी निराली ........
पहले खुद में निरालापन , तो  लायों फकीरों

वो जो  आँखों से आँखें  इश्क की हर बात बयाँ करती थी,

         उफ वो नशेमन "
              वो शानो पर बीती फुरकतों में रातें ........

         अब तो पहली नजर से पहले ,,  काया से काया मिला करती हैं
              जाने ये कौन हैं , ये किसकी दास्तां  हैं ???

          कैसे इनको   तू - पंछी मन इनकी पहचान  से मिलवायेगा

  क्या फिर से धरती पर  राधारमण आलिंगन  रास रचाय्रेगें ।   


वो जो पत्तों पर ओस की चमक है ,

वो जो बारिश में धूलि फूलों में रंगत है
 वो जो प्यार में पिघलती पत्थरों की पनघट है

वो जो दूर से लचकती  अमोलियों  की कमर है
ये जो चूड़ियों की खनक में महकती  कशक है

ये जो लोरियों में निखरती बचपन से जवानी का सफ़र है
ये जो  पथराई आँखों को सूद से मूल स्वरित   है

ये जो माहवार से सजे पाँव पर झुका  पुरुषसार्थ का अहम हैं  

  ये  जो स्वार्थहीन दोस्ती का छलकता सागर है

सुनो ऐ फकीरों ये सब तुम्हारी ही  विरासतें हैं 

यही है वो दौलत बासिंदों ,
जिन  से इक इक बूंद  जिन्दगी की सागर बना करती है
तो अब चुन लो मोतियाँ विरासतों से ,                                             

  और बाटो दोनों हाथों से ये विरासती मोतियाँ पुरे जहाँ में 


जितना बाटोगे उस से दुगना पायोगे फकीरों ............
 हर कण हर पल बस होगा लचीला ,लचीला

और उमरती घुमारती रहेगी

  तेरे पंछी मन में  जवां जिन्दगी की बदलियाँ ...।।



अब तो मेरे पंछी मन मेरे पास लौट आओ 

बनने दो राहतों के सिलवटें मेरे भी दरीचों पर ......
फिर कभी और चुन लाना शब्दों के जंगलों से  
मुहबोली कविता की सहेली .........
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Friday, September 1, 2023

मैं और मेरी नजर



मैं और मेरी नजर ,
 गोंधुली में
जब भी टहलतें हैं
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं
गूँज कर पवित्र  प्राथनायें ,
पहुँचती तो होंगी त्रिकालदर्शि तक ?
जो आज धुप में घुलते -घुलतें 
अस्त हो  जायेंगा। 
कल वही फुंटकर पहाड़ियों से 
किरणों में त्वरित हो 
 जिवन जोत जलायेगा !

मैं और मेरी नजर ,
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं


जो हैं रच चूका ,
वो इतिहास बना जायेंगा 
लेकिन ,कर्म कि आँग में तप कर ,
 क्या रचनाकार कि रचना बदल   जायेंगी  
और  इतिहास  के  हर शब्द में,
 स्वर्णिम आकृति  जड़  जायेंगी 

मैं और मेरी नजर ,
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं

इन आँखों का क्या हैं 
 बाँट टटोलती हैं ,
टटोलती रहेँगी 
क़ोई राहगीर किसी दिन तो ,
टटोलती आँखों में ,
चंद और साँसे टपका जायेंगा  
मैं और मेरी नजर ,
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं!!

रचनाकार आगाह करता और सुनाता हैं 
जो भी हैं अवस्था 
उसमें ही अनुकूल बने रहना
 जिवन यथार्थ बनता हैं 

  सोंच कि अधर पर  भी,
होता अगर इक तिल जैसा 
तो अच्छी सोंच को नजर न लगती 
और बंद हो जाता आवागमन 
बुरी सोंच का ,

 टहनिओं से गिरती संभलती ,
ओस कि बूँदों में भी ,
कितना असीम सामर्थ हैं,
बिन सिकायत धुप से  
छुपन छुपायी खेलती  हैं 
 और  ठीक विपरीत 
सरे आम इंसान विचरता हैं 
भूखें पेट के चिमनी  में ,
इक रोटी डाल  न पाया 
 और  रामायण दान से 

दोष मिटाना  चाहा 
ईर्ष्या , द्वेष कुट निति 
ह्रदय का नर्तन भंगकर 
गुरु दान के घोड़े चढ़े ,
मूर्खं कि भी इक ही 
अभिलाषा। . 
दान, धर्म से बैकुंड पाना !

राह उस केदारनाथ कि 
निर्धन के घर दीप जलाना 
फिर चाहें जाओ न जाओं 
कासी ,मक्का मदीना   

मैं और मेरी नजर ,
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं
 इंसान को इंसान से ,
पहचान  भर हो जायें 
तो फिर से फरिश्तों कि 
पालकी धरती पर उतर जायें  


Sunday, August 27, 2023

अह्सास


कितना प्यारा ये अह्सास है,

जो  बिजली से मुझे बरखा बनता हैं ।

हर पल हर कही तुम्हें मेरे साथ पिरोता है 

अपने नयनों के  तीखे विचारों से ,

लगाई बेड़ियाँ हमने ,इन अहसासों के पंखों पर '

 जाने कब ये बेड़िया पाज़ेब बनी
  "और " 

तुम्हें  छूकर ये अहसास ,बिन सावन फुहारों के झूले  झूलता हैं ।

कितना प्यारा है ये अहसास ......... 

निगोड़ी इन अहसासों का बावला मन तो देखो ;

वही छनकती हैं इनकी  पाज़ेब ''
    
 जिनसे पर्दा कर कोताहल करती हैं ।
          
 धिरे धिरे रेशमी रातों में,  
मंतरंग  में सपनों की  डोली सजाती  हैं "
   '  और "
चुपके के से  अलसाई  नींद विहल में हलचल  मचाकर ,,  
            
   हौले से कह जाती है .. 
कितना प्यारा ये अहसास है ,
 जो बिजली से मुझे बरखा बनता है 

की हमने तामाम कोशिशे ,,,,,, 
की न छू; सके हमे उन बेहोश नाजरों का  ख़ुमार ,
      ' पर'
ये अहसास बस   एक बूंद बनकर ,

बंध गया हमारे दुपट्टे के कोने  से  ,

  जैसे ही दुपट्टे के कोने से .........आँखें थप  थपाई हमने ,,

आँखों से उतरकर बूंद दिल में सागर बन गया,

'और'  तब से ही ये आलम है
 हम अपने ही अह्सासी बारिश में भिंग कर  सराबोर हो रहे हैं 

अब ये सैलाब कहाँ ले जायेगा हमें ??
 ये तो  शायरी ऐं ग़ालिब तेरे हवाले ।

कितना प्यारा ये अहसास है ....
जो मुझे बिजली से बरखा बनता है  ..........

ये कैसी खुशबू सी है फैली , हमारे सिरहाने के तले,,

कजराई कवारें तराईयों में ...
अभी भी छलक रहा है वो पैमाना  कवारा  कवारा'  
नही जानती ये आँखें ...  

 कितने बरस हैं और अभी,


 इन आँखों में की तराईयों में ,,,   ये कवारी काजलें ?
जो बिखरकर मोती से नूर की बूंद  बन गयी,

जो  इकतर्फा प्यार की मेंहदी  रचाकर ,

इश्किया तेरे आँगन में रंगों से भरी तस्वीर बन गयी,
  होगी कोई तो हद इन  बाँवरे अहसासों के..........                                 
         
  उस हद की हद तक ,तकेगे राह  ये कोने दुपट्टे के ,    

पीले सरसों के पायल किसी दिन तो छ्नकेगे ,

होगी किसी दिन तो चूड़ियों की रंग सुर्ख ,

होगा किसी दिन पूरा सावन मेरी   घंरायी बादलों में ,

हैं अभी तलक और रहेंगे ......प्यार के कशक में 

 मेरी तराईयों में ये काजल, और मेरे दुपट्टे कवारें  ,,

 कितना प्यारा ये अहसास है 
जो बिजली मुझे बरखा बनता हैं।
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