Friday, May 16, 2025

हुई शाम तो ये जाना हमने
तन्हाईयों  की कुछ और अमोली सज गई हमारे दरिचें में 
अब देखे सुबह की बेल  इनअमोलियों को  पका सकी तो ठीक है
नही तो जी लेगे हम जैसे जिए जाते हैं 

Monday, May 5, 2025

और मेरी साइकिल

और मेरी साइकिल

यह कहानी है एक ऐसे लड़के की जिसे अपनी साइकिल से बेहद प्यार है।

बिहार के कैमूर ज़िले के बरौला गाँव में मनीष नाम का एक लड़का अपने माता-पिता और दो बड़ी बहनों के साथ एक सीधे-सादे ब्राह्मण परिवार में रहता है। मनीष बचपन से ही बहुत बुद्धिमान और मेहनती रहा है। उसे बड़े सपने देखने का बहुत शौक है। वह अक्सर सोचता है कि बड़ा होकर एक सफल बिज़नेसमैन बनेगा और अपने गाँव के सभी दोस्तों को अपनी कंपनी में नौकरी देगा।

रात के ठीक 9 बजे खाना खाकर वह छत पर अपनी खटिया पर सो जाता है और सपनों की दुनिया में खो जाता है। उसके दादाजी का नाम राम दिनकर जी है, माताजी का नाम श्यामो देवी है, और बहनों के नाम रितु और नीलम हैं।

मनीष इस समय 14 साल का है और शहर के स्कूल में 10वीं कक्षा में पढ़ता है। उसके बाबूजी ने वादा किया है कि 10वीं के बाद वे उसे आगे की पढ़ाई के लिए पटना या दिल्ली भेजेंगे। मनीष सोचता है—"क्या कैमूर में अच्छी पढ़ाई नहीं हो सकती? ऐसा क्या है पटना या दिल्ली में जो यहाँ नहीं?"

मनीष रोज़ाना तीन किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाता था। एक दिन बाबूजी ने उसे साइकिल लाकर दी और कहा, "अब तुम्हें पैदल नहीं चलना पड़ेगा, पढ़ाई पर ध्यान दो।"

जब उम्मीद से बढ़कर कुछ मिल जाए तो जो खुशी होती है, वही खुशी मनीष के चेहरे पर थी। वह अपने बाबूजी को गले लगाकर बोला, "आपने मुझे क्या ग़ज़ब की चीज़ दे दी पिताजी! मैं बहुत खुश हूँ। वादा करता हूँ, यहीं रहकर मेहनत से पढ़ूँगा और बड़ा आदमी बनूँगा।"

बाबूजी हँसते हुए बोले, "बेटा, ये बिज़नेस-विज़नेस छोड़ो, सरकारी नौकरी की तैयारी करो।"

अगले दिन मनीष बहुत खुश था। उसने अपनी साइकिल का नाम 'बेस्ट फ्रेंड' रख लिया था। वह अपनी साइकिल से इतनी आत्मीयता रखता था कि स्कूल जाते समय आधे रास्ते पर रुककर बोला, "अब तुम थक गई होगी, चलो मैं तुम्हें कंधे पर उठा लेता हूँ।"

रास्ते में जब लोगों ने देखा कि मनीष साइकिल को कंधे पर लेकर जा रहा है, तो सभी पूछने लगे—"क्या साइकिल खराब हो गई?" मनीष बोला—"नहीं, नई साइकिल है। आधा रास्ता उसने मुझे चलाया, अब मैं उसे आराम दे रहा हूँ।"

लोगों ने चकित होकर कहा—"तेरा दिमाग ठीक है क्या?" मनीष मुस्कुराकर बोला—"मोरल साइंस में पढ़ाया गया है कि जो हमारी सेवा करता है, उसका आदर करना चाहिए—चाहे वह वस्तु हो, पक्षी हो या जानवर।"

स्कूल में कुछ लोगों ने उसकी मासूमियत को पागलपन समझ लिया। लेकिन उसके क्लास टीचर दिनकर ओझा जी ने उसे प्यार से समझाया—"मनीष, साइकिल तुम्हारी मदद के लिए बनी है। उसका सम्मान करो, लेकिन उसके अस्तित्व का मज़ाक मत बनाओ।"

मनीष ने बात समझी और मुस्कुराकर बोला—"सर, मैं समझ गया। लेकिन क्या किसी वस्तु की सेवा करना मानसिक संतुलन खोने जैसा है?"

टीचर ने उसका सिर सहलाते हुए कहा—"नहीं मनीष, तुम्हारे भावों की हम कद्र करते हैं। जो तुम्हें सही लगे, वही करो।"

रात को मनीष ने बाबूजी से पूछा—"क्या मैं अपनी साइकिल का नाम रख सकता हूँ?" बाबूजी बोले—"हाँ बेटा, क्यों नहीं? मैंने भी अपनी साइकिल का नाम 'तुला' रखा था।"

मनीष खुश होकर बोला—"ठीक है पिताजी, मैंने भी नाम सोच लिया है—‘मास्टर पिंटू’।"

अगली सुबह मनीष बोला—"मास्टर पिंटू, चलो स्कूल चलते हैं।"

स्कूल में बच्चों ने उसका मज़ाक उड़ाया, लेकिन मनीष चुप रहा। उसने प्रिंसिपल से अनुरोध किया कि वह असेंबली में अपनी बात रख सके। अनुमति मिल गई।

अगले दिन असेंबली में मनीष ने भावुक होकर कहा—"क्या किसी वस्तु से प्यार करना गलत है? मैंने अपनी साइकिल को बेस्ट फ्रेंड माना, और उसे आराम देना चाहा। क्या ये पागलपन है? आज मैं आप सबको अपने बेस्ट फ्रेंड ‘मास्टर पिंटू’ से मिलवाना चाहता हूँ।"

पूरा स्कूल तालियों से गूंज उठा। प्रिंसिपल मैम ने कहा—"मनीष जैसे छात्र पर हमें गर्व है।"

वक्त बीता, मनीष 10वीं की परीक्षा देने लगा। बाबूजी बोले—"अच्छे नंबर लाओ तो नई साइकिल दूँगा।" मनीष बोला—"पिताजी, मेरा पिंटू बिल्कुल ठीक है। बस उसके टायर बदलवा दीजिए।"

एक शाम उसकी बहनों ने कहा—"मनीष आज भी पहले जैसा ही है।" बाबूजी ने पूछा—"क्या ऐसे लोग तरक्की कर पाएँगे?" बहन बोली—"बिल्कुल पिताजी, मनीष जैसे लोग ही इंसानियत का परचम लहराते हैं।"

आज भी मनीष अपने मास्टर पिंटू की सेवा करता है, उससे बातें करता है। उनकी दोस्ती एक मिसाल बन चुकी है।

सारांश:
चाहे हम कितनी भी कीमती चीज़ें खरीदें, उनका आदर और देखरेख करना हमारा कर्तव्य है। जब हम चीज़ों या लोगों के प्रति ज़िम्मेदार होते हैं, तभी हमारा व्यक्तित्व एक संपूर्ण रूप लेता है।

Tuesday, April 29, 2025

कैसे रिश्ते नाते हैं।

 कैसे रिश्ते-नाते हैं
(लेखिका: @retrovd007), pen name सुकून 

ये कैसे रिश्ते-नाते हैं...
कभी कितने अपने,
तो कभी अजनबी बन जाते हैं।
चाहकर भी मुश्किल है इन्हें भुला पाना,
क्यों दिल के अपने
इतनी तकलीफ़ दे जाते हैं,
रूह तक दस्तक दे जाते हैं...
ये कैसे रिश्ते-नाते हैं।

मेरा मन यूँ ही कोरा नहीं
स्याही-स्याही रहता,
कुछ तो चलती हैं
रिश्तों की पतझड़ हवाएँ।
फिर तो लिख ही जाती हूँ
दिल के कटघरे में
एक दस्तावेज़... चुपचाप।

कब तक मुझसे लेते रहोगे सब?
क्या कभी मेरी छत पर भी
उतरेगा  कोई पोटली, बाबा?

मैं हूँ... इक हवेली जैसी—
जिसके ख़्वाबों का दरवाज़ा बंद है।
जी रही हूँ,
क्योंकि जीना मजबूरी है,
वरना अब कहाँ
पायल में वो ‘छम-छम’ है।

हर ओर खिंचातानी है,
ग़नीमत है कि अभी तक
साँस लेने पर पाबंदी नहीं।

ये कैसे रिश्ते-नाते हैं...

न ये मेरा घर है
जहाँ मैं कली से पलाश बनी,
न वो मेरा घर
जहाँ मैं गई चुटकी भर लाल रंग में।
तो फिर बता, हे नंदलाल,
किस हित तूने मुझे
धरती की गोद में रचा?

मैं अपने ही रंगों से
जीवन सजा लूँ,
तो कसम राम जी की—
कोहराम मच जाता है।
मैं ज़्यादा तो नहीं माँगती,
बस दो टूक ही सही,
पर मेरा खुद का आसमान तो मिले!

एक सवाल सी हूँ
कैलाश नगर के दरबार में—
ना बाबुल की, ना साजन की।
बस एक घर चाहिए,
जिसके दरवाज़े पर
लिखा हो मेरा नाम...

Saturday, April 12, 2025

मुहब्बत करना !


रखना दिल में  नमाज़ी  नियत 
तो  
मुहब्बत करना !
होना खुद से जुदा 
तो 
मुहब्बत करना !

हो बरगद जैसी छावनी 
तो 
मुहब्बत करना !

शिदत हो गर दिया बाती जैसा ,
 तो 
मुहब्बत करना!
मुस्कानों में हो  नमीं पनघट की ,
तो 
मुहब्बत करना !

तन में हो खुशबूँ  गंधक की 
तो
 मुहब्बत करना!

 गर बाँच सकों कल्माई ऑंखें 
तो 
मुहब्बत करना !

बना सको जिगर  शिखर में मंदिर 
तो 
मुहब्बत करना !

हो जबां अशिर्बादी 
तो 
मुहब्बत करना!

हो रूह तक चौधवी   चमक 
तो 
मुहब्बत करना !

चल सकों राह से राह तक 
तो
 मुहब्बत करना !

जो समां सके इक ग्रन्थ में 
ये वो सज्दां नही ,

मिल सके अंत छितीज 
ये वो त्रिलोक नही 
हो हर मन  राधा रमण 
करें हर दिल बस ऐसी ही 
पाकिजी मुहब्बत 
हर कही  हर तरफ .......






Monday, April 7, 2025

इक शहर तो हो अपना सा



उमिंदों के काफिलें बसाकर ख्वाबों के गाँव में ,




वो कहतें हैं की अब ये शहर अपना नही ,

जिस शहर की गलियों ने उनको जीने की राह दी ,

उसे छोड़ जाने से बंजाड़े का दिल धड़का नही,

खुश होकर तह दर सजाई अमर लताओं की डालें,

बनफूल से भी ज्यादा खिली

घर के कोने कोने में बसी अटखेलियाँ

और रही हरदम ही बिखरती मदहोशियाँ

अभी थोड़ा वक्त ही चला था ,

नयें विशातों के सिरहाने से

की !!

शहर के चौराहें पे मचां रहा कोई  शोर था ,


हवलें- हवलें आ रही थी आवाजें,
चारो तरफ भीड़ था बड़ा भीड़ था 

लेकिन क्या खूब नजारा था …। 

शहर के चौराहें पर शहर ही मचां रहा शोर था ,

और जोड़ -जोड़ से बंजlड़ें को लगा रहा आवाज़ था

कब तक यहां वहां रहेगी ,

तेरी दरो दिवार की तस्वीरें ,

किसी गली ,किसी मोड़ पे  या दूर किसी चौराहें पे ,

हक हो अपनेपन का ,

अरे किसी शहर से तेरा भी नाता हो 

कह सके तू भी 

अपनी पनाहों के  छाँव से ,

ये शहर मेरा अपना हैं कोई बेगाना नही ,

कुछ यहाँ मिला हैं ।कुछ वहाँ  मिलेगा …. 

जाने क्या कुछ - कहाँ  छूटता रहेगा ?

उफ ये कैसी बिरहन सी बात चली हैं ,

छोड़ों  भी ये कम ज्यादा  ।और ज्यादा  पाने की लालसा ,

हो थोडा सा या ज्यादा … 

बस लेकिन कम से कम ,

इक शहर तो हो अपना सा …. 

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Thursday, February 27, 2025

ये कौन हैं

ये कौन हैं 
 जो  मेरें दिल की धरती पे फैल रहां हैं सार्थक धुप बनकर 
 समंदर में समंदर का नर्तन करा रहा हैं 
पल पल में सदियों की साँसें जोड़ रहां  हैं ,
हर बूंद में आकाश गंगा बरसा रहा हैं , 
ये कौन हैं जो
 मुझको दीवानी कर खुद घूम रहा हैं होश  वाला बनकर 

मेरे तन के टहनियों में बनता जा रहा हैं प्यार की पतियाँ ,
जब थक जाता हैं शोरें हरकत ज़माने की अदा  से ,
तो पूछता हैं खुद की महफिल में गवाह बनकर 
तू कौन हैं जो मुझमें उतरती जा र!ही हैं सरगम बनकर  !  

चंचल मन फकीरा जैसा, हैं ये बिलकुल चाँद तारों जैसा ,
रखता हैं दिल में अदब नबाबों जैसा ,
हैं तो खुद परेशा  हथेलियों में छबी लकीरों से ,
बाँटता फिरता हैं फिर भी खुशियाँ  जुगनुयों जैसा  ,
ये कौन हैं ..
जिसे बचाकर आफतों से रखना चाहतें हैं,
 दिल में कुदरत तेरी अमानत समझकर 
ये कौन हैं 
जो  मुझ में  जी रहा हैं   मेरी जिंदगी बनकर .............   
           
क्यों हैं तुझ से इतनी मुहब्बत बतां जरा ,
 पहचानता क्यों हैं मेरे नैनो के दस्तक बतां जरां, 
रुकता क्यों हैं मेरी सोच पे दर्सा जरां ,
मैं राह नही तेरी तो मुड़ता क्यों हैं मेरी ओर -जता जरां ,
हक से हैं तू प्रेम्परिसर में बैठा 
क्या हैं तुझ में मेरा भी आना जाना समझा जरां 

न पहले तू कुछ बोल न अब बोल पायेगा ,
दिया हैं तुझ को ही सारा सनातन 
लेकिन मान ले मेरी इक ही अर्जी 
हु मैं संग -संग तेरे 
बस हर पल तू मुस्कुरा जरां  


 


Wednesday, October 30, 2024

ये कैसे रिश्तें नातें हैं



ये कैसे रिश्तें नातें हैं
 कभी तो कितने अपने   ,और कभी पराएँ हो जातें हैं 
चाह  कर भी इन्हें हैं  मुश्किल   भुलाना 
क्यों दिल के अपने  इतनी तकलीफ
 रूह तक दस्तक दे जातें हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

मैं मेरा कोरा मन युही नही स्याही स्याही करती 
कुछ तो चलती हैं रिश्तों की  पतझड़ हवाएं ,
फिर तो लिख ही जाता हैं दस्तावेज दिल के कटघेरे  में ,

कब तक मुझसे लेतें रहेंगे ,,
क्या कभी उतरेगा मेरी छत पे भी
कोई  पोटली बाबा 

मैं हु इक हवेली जैसी ,
जिसके खाब   का  दर  बंद हैं 
जीना हैं इस लियें जी रही हूँ ,
वरना अब कहा पायलों में छम छम हैं 
   
  ये हर तरफ से खिचातनी हैं 
गनीमत हैं की अभी तलक 
साँस लेने पे नही कोई पाबन्दी हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

  न ये मेरा घर हैं जहाँ मैं कली से बनी फूल पलाश की 
  न वो मेरा घर हैं जहाँ मैं गयी चुटकी भर लाल रंग से 
  तो बता जरा वाटिका छबी नन्द लाल   की  
  कौन से हित खातिर तुने रचा मुझे धरती की गोद में 

 मैं मेरे रंग से जीवन सजा लूं ,
   तो कसम राम जी की 
   धरती में कोहराम हैं 
   मैं ज्यादा तो नही मांगती 
   बस    दो टूक    ही सही 
    लेकिन मुझको मेरा ही आसमान मिलें 

  इक सवाल सी हैं  कैलाश नगर के दरबार में  
  ना वो बाबुल का हो ,ना साजन  का  
इक घर ऐसा हो जिसके दरवाजें पे लिखा मेरा नाम हो 
   


   

Monday, September 30, 2024

दबे पाँव जिंदगी चलती रही

दबे पाँव जिंदगी चलती रही ,
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

 स्याही  और कलम रेंगती रही 
 रात भर बाँट टटोलती रही ,
ना आह निकली ,ना कराह 
शब्दों के जंगल में ,
खाली पायल झुठा नर्तन करती रही । 

दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

राह ढूंढ लेती मोतियाँ ,
मगर ?
शिप हर पल अपनी शक्ल बदलती रही ,
मन के सरहदों में जाने ,
और कितने? 
सरहदें खिंचेगी हसरतें । 
 सिरहाने   मे  बंद कमरा ,
स्वप्न बुनता रहा ,
और चुपके -चुपके 
भाग्य चिमनी चलाती रही 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

कुछ गुजर  कर  भी '
सुना हैं --लौट आतें हैं ,
दस्तकों पे नक्स  सजा जातें हैं ,

यें कैसा ? ख़ौफ हैं 
जो गुजरता भी नही ,
चीखता भी नही ,
बस आँखों में काज़ल खरोंचता रहता हैं 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.…

आँखें सोंचकर उनका दर्द  भी ,

आँसुओं की डली भर्ती रही ,
और बे-अदब ,बे- ख़बर 
दम भर  राहती साँस भरता रहा । 

मोम की तरह पिखलना ,
काँच की तरह टूटना ,
ये भाव अब बड़े बेगाने हैं ,
सागर की तरह हिलोरना ,
कुंकुम की तरह मिलना ,
ये भाव  अब हमारे   हैं ,
तोड़ने  वालें तोड़तें  रहे ,
और पुरवा ब्यार भी ,
सनसनाती कुदाल चलाती रही ॥  

दबे पाँव जिंदगी चलती रही
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

थककर बैठ जाऊं , 
  या झुझ कर लड़ जाऊं 
हारूंगी नहीं लड़ती रहूंगी 
जिंदगी तेरे साथ चलती रहूंगी।।
दबे पाँव जिंदगी चलती रही
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

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Thursday, November 16, 2023


जब पिता खुश होकर शाबाशी देंतें हैं ,
जब दूसरों के चेहेरें पर मुश्कान सी खील  जाती हैं ,
जब माँ की लोरी सुनकर मासूम सो जातें हैं ,
बस इन्ही राहों से चल कर भगवान  मिल जातें हैं. 

Friday, November 3, 2023

'मेरे पंछी मन



उड़  उड़ के मेरे पंछी मन तू क्या खोजता है,

हर तरफ शोर है ,किन सुकूनी   संतों की तुझे तलाश है,
वो जो भाव हुआ करते थे गोधुलि की बेला में ,
वो जो भाव उभरते थे धरती और अम्बर  के मिलन से,
वो जो घोसोलों से मीठी धुन भोर का मुख निहारती थी,
" मेरे बवाले पंछी मन" 
 उसे तो शहरीकरण रूपी दानव ने अपना आहार बना लिया है।

अब तो सुकून भरी पलकों से भी दूर भागते हैं लोग ,

नींद आये या न आये-
 कुछ तो  थोरी सी मदिरा पीकर सो जाते हैं
 और कुछ सोने की कोशिश में सुबह तलक झप्की भरते हैं
जाने किस मृग तृष्णा की खोज   में सब दौर रहे हैं ?
कौन समझेगा किसने समझा है ...

देह रूपी दुकान का सांसे  पतवार हैं,
कब  मिट्टी हो जाएँ क्या ऐतबार   है।।

 क्यों है फैला बेरुखी का आलम ,

 क्यों है रिश्तों में टूटी पगडंडी सी  हालत ,
 क्यों मन में बोझ लिए जीयें जा रहे हैं लोग ,
 थोड़ी तो नमी से  खुद को नवाजों फकीरों ....
 है ये दुनिया बड़ी निराली ........
पहले खुद में निरालापन , तो  लायों फकीरों

वो जो  आँखों से आँखें  इश्क की हर बात बयाँ करती थी,

         उफ वो नशेमन "
              वो शानो पर बीती फुरकतों में रातें ........

         अब तो पहली नजर से पहले ,,  काया से काया मिला करती हैं
              जाने ये कौन हैं , ये किसकी दास्तां  हैं ???

          कैसे इनको   तू - पंछी मन इनकी पहचान  से मिलवायेगा

  क्या फिर से धरती पर  राधारमण आलिंगन  रास रचाय्रेगें ।   


वो जो पत्तों पर ओस की चमक है ,

वो जो बारिश में धूलि फूलों में रंगत है
 वो जो प्यार में पिघलती पत्थरों की पनघट है

वो जो दूर से लचकती  अमोलियों  की कमर है
ये जो चूड़ियों की खनक में महकती  कशक है

ये जो लोरियों में निखरती बचपन से जवानी का सफ़र है
ये जो  पथराई आँखों को सूद से मूल स्वरित   है

ये जो माहवार से सजे पाँव पर झुका  पुरुषसार्थ का अहम हैं  

  ये  जो स्वार्थहीन दोस्ती का छलकता सागर है

सुनो ऐ फकीरों ये सब तुम्हारी ही  विरासतें हैं 

यही है वो दौलत बासिंदों ,
जिन  से इक इक बूंद  जिन्दगी की सागर बना करती है
तो अब चुन लो मोतियाँ विरासतों से ,                                             

  और बाटो दोनों हाथों से ये विरासती मोतियाँ पुरे जहाँ में 


जितना बाटोगे उस से दुगना पायोगे फकीरों ............
 हर कण हर पल बस होगा लचीला ,लचीला

और उमरती घुमारती रहेगी

  तेरे पंछी मन में  जवां जिन्दगी की बदलियाँ ...।।



अब तो मेरे पंछी मन मेरे पास लौट आओ 

बनने दो राहतों के सिलवटें मेरे भी दरीचों पर ......
फिर कभी और चुन लाना शब्दों के जंगलों से  
मुहबोली कविता की सहेली .........
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Friday, September 1, 2023

मैं और मेरी नजर



मैं और मेरी नजर ,
 गोंधुली में
जब भी टहलतें हैं
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं
गूँज कर पवित्र  प्राथनायें ,
पहुँचती तो होंगी त्रिकालदर्शि तक ?
जो आज धुप में घुलते -घुलतें 
अस्त हो  जायेंगा। 
कल वही फुंटकर पहाड़ियों से 
किरणों में त्वरित हो 
 जिवन जोत जलायेगा !

मैं और मेरी नजर ,
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं


जो हैं रच चूका ,
वो इतिहास बना जायेंगा 
लेकिन ,कर्म कि आँग में तप कर ,
 क्या रचनाकार कि रचना बदल   जायेंगी  
और  इतिहास  के  हर शब्द में,
 स्वर्णिम आकृति  जड़  जायेंगी 

मैं और मेरी नजर ,
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं

इन आँखों का क्या हैं 
 बाँट टटोलती हैं ,
टटोलती रहेँगी 
क़ोई राहगीर किसी दिन तो ,
टटोलती आँखों में ,
चंद और साँसे टपका जायेंगा  
मैं और मेरी नजर ,
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं!!

रचनाकार आगाह करता और सुनाता हैं 
जो भी हैं अवस्था 
उसमें ही अनुकूल बने रहना
 जिवन यथार्थ बनता हैं 

  सोंच कि अधर पर  भी,
होता अगर इक तिल जैसा 
तो अच्छी सोंच को नजर न लगती 
और बंद हो जाता आवागमन 
बुरी सोंच का ,

 टहनिओं से गिरती संभलती ,
ओस कि बूँदों में भी ,
कितना असीम सामर्थ हैं,
बिन सिकायत धुप से  
छुपन छुपायी खेलती  हैं 
 और  ठीक विपरीत 
सरे आम इंसान विचरता हैं 
भूखें पेट के चिमनी  में ,
इक रोटी डाल  न पाया 
 और  रामायण दान से 

दोष मिटाना  चाहा 
ईर्ष्या , द्वेष कुट निति 
ह्रदय का नर्तन भंगकर 
गुरु दान के घोड़े चढ़े ,
मूर्खं कि भी इक ही 
अभिलाषा। . 
दान, धर्म से बैकुंड पाना !

राह उस केदारनाथ कि 
निर्धन के घर दीप जलाना 
फिर चाहें जाओ न जाओं 
कासी ,मक्का मदीना   

मैं और मेरी नजर ,
अक्सर आसमान से बाँतें करतें हैं
 इंसान को इंसान से ,
पहचान  भर हो जायें 
तो फिर से फरिश्तों कि 
पालकी धरती पर उतर जायें  


Sunday, August 27, 2023

अह्सास


कितना प्यारा ये अह्सास है,

जो  बिजली से मुझे बरखा बनता हैं ।

हर पल हर कही तुम्हें मेरे साथ पिरोता है 

अपने नयनों के  तीखे विचारों से ,

लगाई बेड़ियाँ हमने ,इन अहसासों के पंखों पर '

 जाने कब ये बेड़िया पाज़ेब बनी
  "और " 

तुम्हें  छूकर ये अहसास ,बिन सावन फुहारों के झूले  झूलता हैं ।

कितना प्यारा है ये अहसास ......... 

निगोड़ी इन अहसासों का बावला मन तो देखो ;

वही छनकती हैं इनकी  पाज़ेब ''
    
 जिनसे पर्दा कर कोताहल करती हैं ।
          
 धिरे धिरे रेशमी रातों में,  
मंतरंग  में सपनों की  डोली सजाती  हैं "
   '  और "
चुपके के से  अलसाई  नींद विहल में हलचल  मचाकर ,,  
            
   हौले से कह जाती है .. 
कितना प्यारा ये अहसास है ,
 जो बिजली से मुझे बरखा बनता है 

की हमने तामाम कोशिशे ,,,,,, 
की न छू; सके हमे उन बेहोश नाजरों का  ख़ुमार ,
      ' पर'
ये अहसास बस   एक बूंद बनकर ,

बंध गया हमारे दुपट्टे के कोने  से  ,

  जैसे ही दुपट्टे के कोने से .........आँखें थप  थपाई हमने ,,

आँखों से उतरकर बूंद दिल में सागर बन गया,

'और'  तब से ही ये आलम है
 हम अपने ही अह्सासी बारिश में भिंग कर  सराबोर हो रहे हैं 

अब ये सैलाब कहाँ ले जायेगा हमें ??
 ये तो  शायरी ऐं ग़ालिब तेरे हवाले ।

कितना प्यारा ये अहसास है ....
जो मुझे बिजली से बरखा बनता है  ..........

ये कैसी खुशबू सी है फैली , हमारे सिरहाने के तले,,

कजराई कवारें तराईयों में ...
अभी भी छलक रहा है वो पैमाना  कवारा  कवारा'  
नही जानती ये आँखें ...  

 कितने बरस हैं और अभी,


 इन आँखों में की तराईयों में ,,,   ये कवारी काजलें ?
जो बिखरकर मोती से नूर की बूंद  बन गयी,

जो  इकतर्फा प्यार की मेंहदी  रचाकर ,

इश्किया तेरे आँगन में रंगों से भरी तस्वीर बन गयी,
  होगी कोई तो हद इन  बाँवरे अहसासों के..........                                 
         
  उस हद की हद तक ,तकेगे राह  ये कोने दुपट्टे के ,    

पीले सरसों के पायल किसी दिन तो छ्नकेगे ,

होगी किसी दिन तो चूड़ियों की रंग सुर्ख ,

होगा किसी दिन पूरा सावन मेरी   घंरायी बादलों में ,

हैं अभी तलक और रहेंगे ......प्यार के कशक में 

 मेरी तराईयों में ये काजल, और मेरे दुपट्टे कवारें  ,,

 कितना प्यारा ये अहसास है 
जो बिजली मुझे बरखा बनता हैं।
********************************* 

Friday, February 22, 2013

कितना बेबस सा

कितना बेबस सा

 मन के दरम्यान  प्रफुलित 
हर अरमान मुझको ,
रंगीनियों में सजाकर 
स्वपन डोली में ,
इक रति अंकुर रहा हैं 
ठहर जाती हु मैं 
तेरी रुदादी लकीरों में ,
 और उसपे तेरे 
 पैमानिक सी  आशिकी 
कितना बेबस सा 
दिल की रुबाईयों पे भी 
अंकुश  धर जातें हैं 

तुझमें मेरा होना 
जैसे साँसों  की करवटों पे 
मेरी धडकनों का अलसाना 
मेरे दिल की तराईयों में 
हर पल तेरा स्पंदन हैं 
लेकिन तुझमें मेरा होना 
कितना बेबस सा ......

तेरे मेरे  बीच ये 
 जो बनकर आया था बेनामी सा ,
अब मिली तो जमीं सी 
तेरे ही सरहदी दिल के 
कोनेभर में 
तू परखता रहा 
मेरे सुरूर का अंत 
आखिर लौटा तू 
कितना बेबस सा 
लेकर अनन्त का 
स्वरित राहदान   सा  !!!


Tuesday, July 17, 2012


ये जो बे -नाम सा है ..... 


दिल  ये कहता है की
 टूटकर तुम्हें  प्यार करू ..
हया की बदली बरस जाएँ ..
प्यार का सावन..
अब  बाँहों में झूल जाएँ ।


सजाकर मेंहदी अपने हाथों में ,
लाल रंग भर के तुम्हारी  आखों में ..
आपना चेहरा सवारूँ ........
दिल ये कहता है की 
टूटकर तुम्हें प्यार करू 


वो नक्स सा  जो बन जाता है ...
रातों को टहनियों की बीच झाक्तें चाँद पर ..
फिर सुबह तलक चलती है ..
चाँद और मेरी मेजबानी ,
मांझी मेरे कावेरी मन के  ...
दिल ये कहता है की ....


कभी तो राजे दिल बीछ   जाता 
छुप छुप कर ...
तेरे मन के घरौंदे में  
इन पल्कों के  शिरकत से ,
कभी तुम सज जाते ...
बनकर फूल पलाश के 
मेरे रोहणि मन में ,,


न मैं जता  पाती हु ,
न तुम ही कह पातें हो ,

बुला ही लेता है ..
गुलमोहर दिल तुम्हारा .
हर रोज मुझे ...
नीन्द्नीशा  सिरहाने  में
 ये कौन सा बंधन  है   ..
जिस में तुम मुझे बाँधें जातें हो .... ??
दिल ये कहता है की 
टूटकर तुम्हें प्यार करू ....




क्यूँ मुड़ जाती हैं 
राहें मेरी 
तेरे बनबेली आँगन में 


ना नाम है ,ना इंतजार का इंतजार .
 पांकिजा से इस प्यार में ..
बस एक अहसाह की नमीं  सी है ...
 जो मेरे मनं में घुलता है अमरलता बनकर ।


दिल ये कहता है की 
टूटकर तुम्हें प्यार करू 


हया की बदली बरस जाएँ ..
प्यार का सावन..
अब  बाँहों में झूल जाएँ ।



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Monday, March 5, 2012


इन  वादियों में ये खुशबू सी क्या है?
ये पीले रंग के सरसों, क्यों हवायो से  अटखेल में है ,
क्या है ये मेरे मनआगन की खुशियों की पालकी ...
जो चाहती है की सब खुश रहें ........

मेरे पन्नो पे ये सियाही सी गोधुली ने सजा दी हैं ,
लगता है आज फिर आसमान से परिंदों ने , 
कुछ आफसाने रिश्तों के , मेरे छत पे गिरा दिए हैं  

जब प्यार के रंग बिखारातें हैं लोग ,
जब इन्सान ही इन्सान से मिलता हैं ,
और जब ,जब किसी मजबुर का भला होता हैं,,,
तब ही नजर आतें हैं भगवान.