Friday, May 16, 2025

हुई शाम तो ये जाना हमने
तन्हाईयों  की कुछ और अमोली सज गई हमारे दरिचें में 
अब देखे सुबह की बेल  इनअमोलियों को  पका सकी तो ठीक है
नही तो जी लेगे हम जैसे जिए जाते हैं 

Monday, May 5, 2025

और मेरी साइकिल

और मेरी साइकिल

यह कहानी है एक ऐसे लड़के की जिसे अपनी साइकिल से बेहद प्यार है।

बिहार के कैमूर ज़िले के बरौला गाँव में मनीष नाम का एक लड़का अपने माता-पिता और दो बड़ी बहनों के साथ एक सीधे-सादे ब्राह्मण परिवार में रहता है। मनीष बचपन से ही बहुत बुद्धिमान और मेहनती रहा है। उसे बड़े सपने देखने का बहुत शौक है। वह अक्सर सोचता है कि बड़ा होकर एक सफल बिज़नेसमैन बनेगा और अपने गाँव के सभी दोस्तों को अपनी कंपनी में नौकरी देगा।

रात के ठीक 9 बजे खाना खाकर वह छत पर अपनी खटिया पर सो जाता है और सपनों की दुनिया में खो जाता है। उसके दादाजी का नाम राम दिनकर जी है, माताजी का नाम श्यामो देवी है, और बहनों के नाम रितु और नीलम हैं।

मनीष इस समय 14 साल का है और शहर के स्कूल में 10वीं कक्षा में पढ़ता है। उसके बाबूजी ने वादा किया है कि 10वीं के बाद वे उसे आगे की पढ़ाई के लिए पटना या दिल्ली भेजेंगे। मनीष सोचता है—"क्या कैमूर में अच्छी पढ़ाई नहीं हो सकती? ऐसा क्या है पटना या दिल्ली में जो यहाँ नहीं?"

मनीष रोज़ाना तीन किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाता था। एक दिन बाबूजी ने उसे साइकिल लाकर दी और कहा, "अब तुम्हें पैदल नहीं चलना पड़ेगा, पढ़ाई पर ध्यान दो।"

जब उम्मीद से बढ़कर कुछ मिल जाए तो जो खुशी होती है, वही खुशी मनीष के चेहरे पर थी। वह अपने बाबूजी को गले लगाकर बोला, "आपने मुझे क्या ग़ज़ब की चीज़ दे दी पिताजी! मैं बहुत खुश हूँ। वादा करता हूँ, यहीं रहकर मेहनत से पढ़ूँगा और बड़ा आदमी बनूँगा।"

बाबूजी हँसते हुए बोले, "बेटा, ये बिज़नेस-विज़नेस छोड़ो, सरकारी नौकरी की तैयारी करो।"

अगले दिन मनीष बहुत खुश था। उसने अपनी साइकिल का नाम 'बेस्ट फ्रेंड' रख लिया था। वह अपनी साइकिल से इतनी आत्मीयता रखता था कि स्कूल जाते समय आधे रास्ते पर रुककर बोला, "अब तुम थक गई होगी, चलो मैं तुम्हें कंधे पर उठा लेता हूँ।"

रास्ते में जब लोगों ने देखा कि मनीष साइकिल को कंधे पर लेकर जा रहा है, तो सभी पूछने लगे—"क्या साइकिल खराब हो गई?" मनीष बोला—"नहीं, नई साइकिल है। आधा रास्ता उसने मुझे चलाया, अब मैं उसे आराम दे रहा हूँ।"

लोगों ने चकित होकर कहा—"तेरा दिमाग ठीक है क्या?" मनीष मुस्कुराकर बोला—"मोरल साइंस में पढ़ाया गया है कि जो हमारी सेवा करता है, उसका आदर करना चाहिए—चाहे वह वस्तु हो, पक्षी हो या जानवर।"

स्कूल में कुछ लोगों ने उसकी मासूमियत को पागलपन समझ लिया। लेकिन उसके क्लास टीचर दिनकर ओझा जी ने उसे प्यार से समझाया—"मनीष, साइकिल तुम्हारी मदद के लिए बनी है। उसका सम्मान करो, लेकिन उसके अस्तित्व का मज़ाक मत बनाओ।"

मनीष ने बात समझी और मुस्कुराकर बोला—"सर, मैं समझ गया। लेकिन क्या किसी वस्तु की सेवा करना मानसिक संतुलन खोने जैसा है?"

टीचर ने उसका सिर सहलाते हुए कहा—"नहीं मनीष, तुम्हारे भावों की हम कद्र करते हैं। जो तुम्हें सही लगे, वही करो।"

रात को मनीष ने बाबूजी से पूछा—"क्या मैं अपनी साइकिल का नाम रख सकता हूँ?" बाबूजी बोले—"हाँ बेटा, क्यों नहीं? मैंने भी अपनी साइकिल का नाम 'तुला' रखा था।"

मनीष खुश होकर बोला—"ठीक है पिताजी, मैंने भी नाम सोच लिया है—‘मास्टर पिंटू’।"

अगली सुबह मनीष बोला—"मास्टर पिंटू, चलो स्कूल चलते हैं।"

स्कूल में बच्चों ने उसका मज़ाक उड़ाया, लेकिन मनीष चुप रहा। उसने प्रिंसिपल से अनुरोध किया कि वह असेंबली में अपनी बात रख सके। अनुमति मिल गई।

अगले दिन असेंबली में मनीष ने भावुक होकर कहा—"क्या किसी वस्तु से प्यार करना गलत है? मैंने अपनी साइकिल को बेस्ट फ्रेंड माना, और उसे आराम देना चाहा। क्या ये पागलपन है? आज मैं आप सबको अपने बेस्ट फ्रेंड ‘मास्टर पिंटू’ से मिलवाना चाहता हूँ।"

पूरा स्कूल तालियों से गूंज उठा। प्रिंसिपल मैम ने कहा—"मनीष जैसे छात्र पर हमें गर्व है।"

वक्त बीता, मनीष 10वीं की परीक्षा देने लगा। बाबूजी बोले—"अच्छे नंबर लाओ तो नई साइकिल दूँगा।" मनीष बोला—"पिताजी, मेरा पिंटू बिल्कुल ठीक है। बस उसके टायर बदलवा दीजिए।"

एक शाम उसकी बहनों ने कहा—"मनीष आज भी पहले जैसा ही है।" बाबूजी ने पूछा—"क्या ऐसे लोग तरक्की कर पाएँगे?" बहन बोली—"बिल्कुल पिताजी, मनीष जैसे लोग ही इंसानियत का परचम लहराते हैं।"

आज भी मनीष अपने मास्टर पिंटू की सेवा करता है, उससे बातें करता है। उनकी दोस्ती एक मिसाल बन चुकी है।

सारांश:
चाहे हम कितनी भी कीमती चीज़ें खरीदें, उनका आदर और देखरेख करना हमारा कर्तव्य है। जब हम चीज़ों या लोगों के प्रति ज़िम्मेदार होते हैं, तभी हमारा व्यक्तित्व एक संपूर्ण रूप लेता है।