कैसे रिश्ते-नाते हैं
(लेखिका: @retrovd007), pen name सुकून
ये कैसे रिश्ते-नाते हैं...
कभी कितने अपने,
तो कभी अजनबी बन जाते हैं।
चाहकर भी मुश्किल है इन्हें भुला पाना,
क्यों दिल के अपने
इतनी तकलीफ़ दे जाते हैं,
रूह तक दस्तक दे जाते हैं...
ये कैसे रिश्ते-नाते हैं।
मेरा मन यूँ ही कोरा नहीं
स्याही-स्याही रहता,
कुछ तो चलती हैं
रिश्तों की पतझड़ हवाएँ।
फिर तो लिख ही जाती हूँ
दिल के कटघरे में
एक दस्तावेज़... चुपचाप।
कब तक मुझसे लेते रहोगे सब?
क्या कभी मेरी छत पर भी
उतरेगा कोई पोटली, बाबा?
मैं हूँ... इक हवेली जैसी—
जिसके ख़्वाबों का दरवाज़ा बंद है।
जी रही हूँ,
क्योंकि जीना मजबूरी है,
वरना अब कहाँ
पायल में वो ‘छम-छम’ है।
हर ओर खिंचातानी है,
ग़नीमत है कि अभी तक
साँस लेने पर पाबंदी नहीं।
ये कैसे रिश्ते-नाते हैं...
न ये मेरा घर है
जहाँ मैं कली से पलाश बनी,
न वो मेरा घर
जहाँ मैं गई चुटकी भर लाल रंग में।
तो फिर बता, हे नंदलाल,
किस हित तूने मुझे
धरती की गोद में रचा?
मैं अपने ही रंगों से
जीवन सजा लूँ,
तो कसम राम जी की—
कोहराम मच जाता है।
मैं ज़्यादा तो नहीं माँगती,
बस दो टूक ही सही,
पर मेरा खुद का आसमान तो मिले!
एक सवाल सी हूँ
कैलाश नगर के दरबार में—
ना बाबुल की, ना साजन की।
बस एक घर चाहिए,
जिसके दरवाज़े पर
लिखा हो मेरा नाम...
