Wednesday, October 30, 2024

ये कैसे रिश्तें नातें हैं



ये कैसे रिश्तें नातें हैं
 कभी तो कितने अपने   ,और कभी पराएँ हो जातें हैं 
चाह  कर भी इन्हें हैं  मुश्किल   भुलाना 
क्यों दिल के अपने  इतनी तकलीफ
 रूह तक दस्तक दे जातें हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

मैं मेरा कोरा मन युही नही स्याही स्याही करती 
कुछ तो चलती हैं रिश्तों की  पतझड़ हवाएं ,
फिर तो लिख ही जाता हैं दस्तावेज दिल के कटघेरे  में ,

कब तक मुझसे लेतें रहेंगे ,,
क्या कभी उतरेगा मेरी छत पे भी
कोई  पोटली बाबा 

मैं हु इक हवेली जैसी ,
जिसके खाब   का  दर  बंद हैं 
जीना हैं इस लियें जी रही हूँ ,
वरना अब कहा पायलों में छम छम हैं 
   
  ये हर तरफ से खिचातनी हैं 
गनीमत हैं की अभी तलक 
साँस लेने पे नही कोई पाबन्दी हैं 
 ये कैसे रिश्तें नातें हैं

  न ये मेरा घर हैं जहाँ मैं कली से बनी फूल पलाश की 
  न वो मेरा घर हैं जहाँ मैं गयी चुटकी भर लाल रंग से 
  तो बता जरा वाटिका छबी नन्द लाल   की  
  कौन से हित खातिर तुने रचा मुझे धरती की गोद में 

 मैं मेरे रंग से जीवन सजा लूं ,
   तो कसम राम जी की 
   धरती में कोहराम हैं 
   मैं ज्यादा तो नही मांगती 
   बस    दो टूक    ही सही 
    लेकिन मुझको मेरा ही आसमान मिलें 

  इक सवाल सी हैं  कैलाश नगर के दरबार में  
  ना वो बाबुल का हो ,ना साजन  का  
इक घर ऐसा हो जिसके दरवाजें पे लिखा मेरा नाम हो 
   


   

Monday, September 30, 2024

दबे पाँव जिंदगी चलती रही

दबे पाँव जिंदगी चलती रही ,
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

 स्याही  और कलम रेंगती रही 
 रात भर बाँट टटोलती रही ,
ना आह निकली ,ना कराह 
शब्दों के जंगल में ,
खाली पायल झुठा नर्तन करती रही । 

दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

राह ढूंढ लेती मोतियाँ ,
मगर ?
शिप हर पल अपनी शक्ल बदलती रही ,
मन के सरहदों में जाने ,
और कितने? 
सरहदें खिंचेगी हसरतें । 
 सिरहाने   मे  बंद कमरा ,
स्वप्न बुनता रहा ,
और चुपके -चुपके 
भाग्य चिमनी चलाती रही 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

कुछ गुजर  कर  भी '
सुना हैं --लौट आतें हैं ,
दस्तकों पे नक्स  सजा जातें हैं ,

यें कैसा ? ख़ौफ हैं 
जो गुजरता भी नही ,
चीखता भी नही ,
बस आँखों में काज़ल खरोंचता रहता हैं 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.…

आँखें सोंचकर उनका दर्द  भी ,

आँसुओं की डली भर्ती रही ,
और बे-अदब ,बे- ख़बर 
दम भर  राहती साँस भरता रहा । 

मोम की तरह पिखलना ,
काँच की तरह टूटना ,
ये भाव अब बड़े बेगाने हैं ,
सागर की तरह हिलोरना ,
कुंकुम की तरह मिलना ,
ये भाव  अब हमारे   हैं ,
तोड़ने  वालें तोड़तें  रहे ,
और पुरवा ब्यार भी ,
सनसनाती कुदाल चलाती रही ॥  

दबे पाँव जिंदगी चलती रही
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

थककर बैठ जाऊं , 
  या झुझ कर लड़ जाऊं 
हारूंगी नहीं लड़ती रहूंगी 
जिंदगी तेरे साथ चलती रहूंगी।।
दबे पाँव जिंदगी चलती रही
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

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