Saturday, September 27, 2014

दबे पाँव जिंदगी चलती रही

दबे पाँव जिंदगी चलती रही ,
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 

 स्याही  और कलम रेंगती रही 
 रात भर बाँट टटोलती रही ,
ना आह निकली ,ना कराह 
शब्दों के जंगल में ,
खाली पायल झुठा नर्तन करती रही । 

दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

राह ढूंढ लेती मोतियाँ ,
मगर ?
शिप हर पल अपनी शक्ल बदलती रही ,
मन के सरहदों में जाने ,
और कितने? 
सरहदें खिंचेगी हसरतें । 
 सिरहाने   मे  बंद कमरा ,
स्वप्न बुनता रहा ,
और चुपके -चुपके 
भाग्य चिमनी चलाती रही 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.… 

कुछ गुजर  कर  भी '
सुना हैं --लौट आतें हैं ,
दस्तकों पे नक्स  सजा जातें हैं ,

यें कैसा ? ख़ौफ हैं 
जो गुजरता भी नही ,
चीखता भी नही ,
बस आँखों में काज़ल खरोंचता रहता हैं 

 दबे पाँव जिंदगी चलती रही.…

आँखें सोंचकर उनका दर्द  भी ,

आँसुओं की डली भर्ती रही ,
और बे-अदब ,बे- ख़बर 
दम भर  राहती साँस भरता रहा । 

मोम की तरह पिखलना ,
काँच की तरह टूटना ,
ये अदा अब बंजाड़ें हैं ,
सागर की तरह हिलोरना ,
कुंकुम की तरह मिलना ,
ये अन्दांज अब घराना हैं ,
तोड़ने  वालें तोड़तें  रहे ,
और पुरवा ब्यार भी ,

सनसनाती कुदाल चलाती रही ॥  

दबे पाँव जिंदगी चलती रही
साँस इत्र -उत्र बिखरती रही 
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1 comment:

  1. जिंदगी को चलते रहना चाहिए। चुप्पी व चीख के बीच भी संयत भाव से चलना ही इसका फलसफा है।

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